भारत के सबसे महान व्यक्तित्व के जीवनी :-
रतन टाटा जी का जन्म हुआ था 1937 में उनके माता-पिता के बीच में डिवोर्स हो गया तो उनको अपना बचपन दादी के साथ बिताना पड़ा 1955 में मात्र 17 साल की उम्र में वो यूएस चले गए कॉर्नेल यूनिवर्सिटी पढ़ने के लिए 1962 में उनकी ग्रेजुएशन डिग्री पूरी हुई आर्किटेक्ट की रतन टाटा जी डिग्री से एक आर्किटेक्ट थे उस समय उनका मन था कि यूएस की लाइफ स्टाइल ठीक है वहीं सेटल हो जाते हैं लेकिन दादी ने उनको बचपन से पाला था दादी की तबीयत खराब हुई , दादी के बुलाने पर एक बार में चले आए रतन टाटा जी में जो जेआरडी टाटा है उनके ब्लड रिलेशन में थे या उनको पता था कि यार टाटा ग्रुप का जो उत्तराधिकारी मैं ही हूं मैं ही राजकुमार हूं नहीं और उन्होंने ऐसा करने का क्लेम भी नहीं किया उन्होंने अपने हिसाब से अपना काम कर रहे थे
आईबीएम से उनको ऑफर मिला और वो आईबीएम में नौकरी करने की सोच रहे थे जेआरडी टाटा की मानता थी उन्होंने कहा नहीं यार तुम तो उस टाटा ग्रुप से कहीं ना कहीं जुड़े हुए हो प्लीज जॉइन और टाटा जब तक इंडिया में रहोगे टाटा ग्रुप में ही काम करोगे 1963 में जब वो 26 साल की उम्र थे विधिवत रूप से टाटा ग्रुप में एंट्री की तो सबसे पहले टाटा ग्रुप में जब एंटर हुए छ महीना उन्होंने टाटा मोटर में ट्रेनिंग की उसके बाद चले गए टेस्को जो आज की डेट में टाटा स्टील नाम से जानी जाती है छ महीना वहां ट्रेनिंग की ट्रेनिंग के बाद वहीं टाटा स्टील में एक टेक्निकल ऑफिसर की हैसियत से उन्होंने जॉइन किया काम चालू किया 1969 में 4 साल बाद वो ऑस्ट्रेलिया चले गए ग्रुप का रिप्रेजेंट करने कि टाटा ग्रुप का एक मेंबर चाहिए था तो ऑस्ट्रेलिया गए और टाटा ग्रुप का प्रतिनिधित्व किया 1970 में कुछ समय के लिए उन्होंने टीसीएस में भी काम किया था 1971 में उनको नेल्को का डायरेक्टर बनाया गया जो की लॉस मेकिंग फर्म थी और टाटा ग्रुप ने उम्मीद छोड़ दी थी कि इसमें कुछ हो सकता है पर रतन टाटा जी ने उसको भी ट्रांसफॉर्म किया और कंपनी को बदल दिया
इसके के बाद 1971 में टाटा जो उनकी प्राइमरी कंपनी है उसमें इनको डायरेक्टर बनाया गया 1975 में ने हावर्ड बिजनेस स्कूल से एडवांस मैनेजमेंट का प्रोग्राम किया 1981 में बने टाटा इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर और वहां पर इन्होंने क्या किया टाटा ग्रुप का जो थिंक टैंक है जो प्लान करता है कि अब किस नए सेक्टर में आना अब क्या करना चाहिए और हाईटेक बिजनेस में घुसना इन्होंने नीव रखी थी उसकी 1981 में 1983 में इन्होंने लॉन्च किया टाटा साल्ट जो देश का नमक है वो देश के हमारे लाल ने ही नॉज किया था 1986 में एयर इंडिया के चेयरमैन बने कुछ समय के लिए और फाइनली 25 मार्च 1991 को इनको टाटा ग्रुप के अधिकृत रूप से चेयरमैन बन गए 1991 इस पीरियड को समझना इंटरनल एक्सटर्नल दोनों तरफ हाहाकार मचा हुआ था सबसे पहले बात करते हैं एक्सटर्नल हाहाकार की एक्सटर्नल मतलब उस समय देश की इकोनॉमी खुली थी देखो 91 के पहले देश की इकॉनमी बंद थी तो क्या था लाइसेंस राज था कि अच्छा हर टक बनाने का हर कंपनी को लाइसेंस मिला हुआ था कि अच्छा यह आदमी यह बनाएगा ये आदमी ये बनाएगा कुछ भी बना ले कैसा भी बना ले किसी भी रेट प बेचे माल तो बिक ही रहा था तो उस समय टेंशन नहीं थी कंपटीशन नहीं था और सब अपना काम राजी कुशी कर रहे थे 1991 में
जब अर्थव्यवस्था खुल गई तो विदेशी कॉम्पिटेटिव के पहले जितने भी पुराने ग्रुप थे जो फल फूल रहे थे 91 के बाद सब साफ हो गए आप नाम ही नहीं सुनते आप नाम टाटा ग्रुप का इसलिए सुन रहे हो ग्रुप का इसलिए सुन रहे हो बजज ग्रुप का इसलिए सुन रहे हो क्योंकि इन चार के जो लीडर थे विजनरी थे इन्होंने ग्रुप को संभाल लिया उस समय 91 के पहले इनके आसपास की जो थे सब चले गए काल के काल में तो इन चार लीडर ने देश को संभाल लिया ये तो था एक्सटर्नल क्योंकि उस समय विदेशी कंपनियों से भी लड़ना था और बाकी सब से भी लड़ना था और मैदान खुल गया था इंटरनल चैलेंज तो और खतरनाक था इंटरनल चैलेंज ये था कि साहब उस समय टाटा ग्रुप की अलग-अलग कंपनियां थी 95 कंपनियां मैंने आपको बताया हर कंपनी में एक ना एक ऐसा बंदा बैठा था जो उस कंपनी को अपने हिसाब से चला रहा था टाटा ग्रुप से कोई लेना देना नहीं था क्योंकि इनके पहले जो बॉस थे वो थे जेआरडी टाटा जेआरडी टाटा का व्यक्तित्व इतना भारी था कि उनकी आवाज में दम था एक बार फोन लगा दिया एक बार बात कह दी तो आदमी इधर-उधर हिल नहीं सकता था
लेकिन जब वो चेयरमैन रह रहे तो हर आदमी अपनी-अपनी मनमानी करने लग गया जब रतन टाटा जी भी बने तो एक रूसी मोदी करके थे उनका मानना था कि शायद वो चेयरमैन बनते तो उन्होंने बहुत ज्यादा विद्रोह कर दिया तो इंटरनली इनको विद्रोह का सामना करना पड़ा इन्होंने इस विद्रोह को पूरा कंट्रोल करते हुए पुराने जो व्यक्ति इस तरह की मन तानाशाही कर रहे थे उनको सबको हटाया रिटायरमेंट की एज नहीं थी कोई भी आदमी जब तक जिंदा है तब तक काम कर रहा था रिटायरमेंट की एज डाली नए टैलेंट के लिए जगह बनाई बाकी सब ग्रुप की कंपनीज में अपने हल्के हल्के स्टेक्स बढ़ाए और टाटा सस जो उसकी चेयरमैन कंपनी थी उसका दबदबा बढ़ाया ताकि कोई कंपनी इधर-उधर ना निकले अगर रतन टाटा जी 1991 में जवाइन नहीं करते 2000 तक आते-आते टाटा ग्रुप की 20-30 कंपनियां अलग-अलग डायरेक्शन में चली जाती बिना टाटा ग्रुप के कंट्रोल के उस समय जितनी भी कंपनिया थी सबका फोकस ये था इंडिया में काम करो इंडिया में काम करो इन्होंने कहा रे वई इंडिया इंडिया में तो काम करना है पर पर इंडियन कंपनी बाहर जाके अपना डंका कैसे बजाए गी उस परे इन्होंने प्रयास चालू किया और शुरुआत की सन 2000 से सन 2000 में इन्होंने टेटली जो कि एक ब्रिटिश ब्रांड था
उसको खरीद लिया तहलका मच गया पूरे भारत में और विश्व में कि एक इंडियन कंपनी बाहर जाके विदेशी कंपनी को खरीद ली इंडियन कंपनी के डोमिनेंस की फीयरलेस होने की नीडर होने की यह रतन टाटा जी की देन है उसी साल सन 2000 में इनको मिला पद्मभूषण जो कि भारत का तीसरा सबसे बड़ा सम्मान है 2004 में ये लेके आए टीसीएस का आईपीयू टीसीएस में याद है 1970 में इन्होंने काम किया था इनको पता तो था कंपनी क्या है उसका उस समय इन्होंने आईपीओ किया और आज की डेट में टीसीएस देश की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है टाटा ग्रुप की जितनी भी कंपनियां है उनमें 90 % लाभ अकेली टीसीएस देती है , 2006 में लॉन्च किया डीटीएच सर्विस टाटा स्काय 2008 में , फिर एक बार दाव खेला जगवार को खरीदा लैंडरोवर को खरीदा और उसी साल उनको भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान पद्म विभूषण मिला 2012 में चेयरमैन पद से इन्होंने रिटायरमेंट ले लिया और सायरस मिस्त्री को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया , 2000 में इनको मिला पद्मभूषण जो कि तीसरा सबसे बड़ा सम्मान था 2008 में मिला इनको पद्म विभूषण जो कि दूसरा सबसे बड़े सम्मान था लेकिन ये हकदार हैं देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न के |
